Monthly Archives: November 2015

दासता की बेड़िया “लड़की”

जिन्दगी को चाहे कितने ही पूर्जों में बाँट लो, चाहो तो आकाश को चिर बना खुद को सिर से नख तक ढाँक लो। शरीर की हर नब्ज के खून के एक-एक कतरे से चाहे भलाई लिख लो, चाहे पाताल में … Continue reading

Posted in Uncategorized | 3 Comments

तुम दिवाली हो मेरी…

ना जाने क्यों सब एक अमावस की रात का अँधेरा दूर करने के लिये हजारों दिये जलाते फ़िरते है। क्या सच में दिवाली का मतलब यहीं है? क्या चन्द घण्टे जलने वाले ये दीये पुरी दुनिया का अँधेरा निगल सकते … Continue reading

Posted in Uncategorized | 5 Comments

तुम जो मेरे पुरे चाँद हुये हो…

जब रातें सर्द होने लगती है तो मन करता है तुम्हारे माथे को चूम आऊँ और छोड़ आऊँ अपनी उष्णता के कुछ कतरे तुम्हारी ललाट पर। फिर साँसों से थोड़ी गर्माहट उधार लेकर तुम्हारी आँखों की पुतलियों पर बिखेर दूँ … Continue reading

Posted in Uncategorized | 12 Comments

रिश्वतखोर रातें……

अजीब सी रातें हो गयी है आजकल मेरी, जब तक कुछ लिख ना लूँ चैन की नींद तक नसीब नहीं होती। फ़िर फ़र्क इससे नहीं पड़ता की कुछ पन्नें लिखूँ या दो पंक्तियाँ गढ़ूँ। बस कागज कलम को छू आऊँ और … Continue reading

Posted in Uncategorized | 3 Comments