बारिश…

मैंने बादलोँ को दूर कही;
संदेशा भेजा था,
घिर-घिर आने को;
आसमाँ पे छाने को,
धरती को ढाँक लेने को;
तेरी सूरत गढ़ने को।

ताकी मैं इन घने बादलों को…
पर्वतों को चूमते देख सकूँ;
जैसे मैं हर रोज देखती हूँ,
ख़्वाबो में हमारे अक्सों को।

ताकी मैं दूर क्षितिज में देख सकूँ;
बारिश की बूँदो को
धरती-बादल के मिलन का
सेतु बनते,

जैसे मैं हर रोज देखती हूँ;
हम दोनों को
दुनियां के किसी कोने पर
एक दूसरे के लिए बिलखते,
हमारे आँसुओ को
हमारे प्यार का सेतु बनते।

-ज्योति-जैन

#ये_बारिश_कैसी
#भीतर_भी#बाहर_भी

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About jyoti jain

मैं हर सन्नाटे को पिघलाकर उन्हें शब्दों में गढ़ना चाहती हूँ ताकि जो कभी कहा नहीं वो भी सुनाई दें।
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