कहीं ये आँखे बादल ना हो जाये…

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तुम अगर अभी कुछ नहीं कर रहे हो तो एक काम करना, एक जगह बैठना जहाँ से खुला आसमाँ दिखता है। बैठकर देखना इन बादलों को रोते हुए… और देखना जमीं पर उनके आँसूओं का दरिया बनते हुए। जब बादलों के ये आँसू जमीन पर गिरते है तो उम्मीद की आखरी साँस लेते है। इन साँसों को तुम देखोगे हर बूँद से बनते हुए बुलबुलों में। जब वो बुलबुला टूटेगा, बिखर कर दरिया का हिस्सा बन जायेगा। इस हाल में चीत्कार उठेगा ये आसमाँ, बादल सारे तड़प उठेंगे, तड़पकर शोर करेंगे, चीखेंगे, चिल्लायेंगे… और फिर गरजेगी जोरों से बिजलियाँ।
मैं डरती हूँ कि तुम दूर हो तो कही ये विरह मेरी आँखों को बादल ना कर दें। अगर ऐसा हुआ तो ना जाने मुझे कितनी आखरी साँसों का वज्रपात सहना होगा। तब ना जाने बिजली बनकर मुझमें क्या गरजेगा। तो अगर तुम्हें जरा वक्त हो तो एक काम करना, वहाँ दूर बैठे दुआ करना कि हम दोनों की आँखे कभी बादल ना बन पायें और मैं दुआ करुँगी कि कोई दिन ग़र ऐसा काला हो तो तुम्हारी आँखों के बादल मेरी आँखो के मेहमान हो जाये।

-ज्योति जैन

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About jyoti jain

मैं हर सन्नाटे को पिघलाकर उन्हें शब्दों में गढ़ना चाहती हूँ ताकि जो कभी कहा नहीं वो भी सुनाई दें।
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One Response to कहीं ये आँखे बादल ना हो जाये…

  1. अमित जांगिड़ says:

    मातारानी की कसम खुबसूरत जज्बात हैं ।😥

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