रास्तों का सफर: A journey towards life… Part-1

रास्तों का सफर वो जिन्दगी है जो मैं अपने भटकते हुए ख्वाबों की सच्ची जमीन पर पाती हूं। वो सबक, रास्तों के सिले, दास्तां, कहानियां है… वो पराए है जो इन रास्तों में अपने हुए… बस ख्वाहिश ये है कि ये रास्ते कभी खत्म ना हो… ताकि जिन्दगी में हमेशा कुछ सीखती रहूं… ऐसे ही रास्तों की कुछ यादें मैं साझा कर रही हूं “रास्तों के सफर” की किस्त-1 में… उम्मीद करती हूं पसंद आएगी… ❤

 

स्कूल में जब साइंस पढाई जाती थी तो ये पढाया जाता था की उर्जा ना तो उत्पन्न की जा सकती है ना ही उसे नष्ट किया जा सकता है। उसे सिर्फ़ एक रूप से दूसरे रूप में रुपान्तरित किया जा सकता है। क्या दुआएँ भी ऐसी ही होती है? तुमसे मुझ तक, मुझसे तुम तक यूँ ही स्थानांतरित होती रहती है।

16 दिसम्बर, 2015 का दिन
आजकल रोजाना ही उदयपुर आना जाना लगा रहता। वजहें अलग-अलग कई सारी होती। उस दिन आखरी पेपर था मेरे एक्जाम का। एक्जाम टाइम सुबह 10 बजे का था। लगभग 45-50 कि.मी. की दूरी तय करनी होती थी एक्जाम सेन्टर तक पहुँचने में… घर से बस, बस से उदयपुर, उदयपुर से ऑटो फ़िर आता एक्जाम सेन्टर। इन सबके लिये सुबह 8 बजे घर से निकलना ही होता। इस कड़ाके की सर्दी में सुबह 8 बजे घर से निकलना सच में मुसीबत सा लगता था। लगातार एक्जाम की वजह से सिर्फ़ एक रात मिलती पढ़ने को। टेंशन इतनी की रात भर नींद नहीं आती और आँखो में नींद इतनी की पढ़ना वैसे ही मुमकिन नहीं हो पाता। आखरी पेपर तक तो आँखे सूज गई थी लेकिन शुक्र था की गुलाबजल हमेशा साथ रहता।

 

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रास्तों का सफर… A journey towards life.  


आखरी पेपर के बाद जब बस में बैठी तो लगा की एक झपकी तो ली ही जा सकती है क्योंकि बैठने के लिये अच्छी सीट भी मिल ही गयी थी। थोड़ा रास्ता बस ने तय किया ही था और मैं उस एक अदद चैन की नींद को बुला ही रही थी कि तभी पास वाली सीट पर बैठे अंकल पूछने लगे- “बस से उतरकर श्रीनाथजी के मन्दिर कैसे जाया जाता है?” “रास्ता किधर है?” “कोई ऑटो मिलेगा की नहीं?” “और नाथद्वारा में और कौन-कौन सी जगह है घूमने की?”
ये तो मैं समझ गयी की वे नाथद्वरा के नहीं है और अतिथि देवो भव: तो हमारे राजस्थान की परम्परा रही है। अपनी नींद की तलाश वहीं रोक, मैं आँखों में फ़िर से गुलाबजल डाल, आँखो पर वहीं काला चश्मा चढ़ा उन्हें मन्दिर, लालबाग, एकलिंग जी वगैरह सबके बारे में बताने लगी। साथ में वहाँ जाने के साधन के बारे में भी विस्तार से बताने लगी की कहा तक बस से जाना है, कहा उतरकर ऑटो पकड़ना है सबकुछ।

 

 

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वे यू पी से यहाँ घूमने आये है ये उन्होनें आगे की बातचीत में बताया। और मैं जर्नलिस्म कर रही हूँ, उसी का पेपर देकर अपने घर लौट रही हूँ ये मैनें उन्हें बताया।
इतने में जब नाथुवास के बाद वल्लभ आश्रम आया तो उन्हें वहाँ भी आने को कह दिया कि लौटते वक्त यहाँ जरुर आइयेगा श्रीनाथजी के बारे में बहुत कुछ जानने को मिलेगा। वो खुशी से उस आश्रम को देखते रहे तब तक जब तक की वो पीछे नहीं छूट गया।
फ़िर जब हम बस से उतरे तो वे ऑटो का पूछने लगे मैनें कहा इधर से आगे जाकर मिल आयेगा। वे फ़िर भी कन्फ़्यूज लगे तो मैनें कहा की चलिए मैं आपको ऑटो तक ले ही चलती हूँ। उन्हें ऑटो तक पहुँचाकर वापस जाने को मुड़ने लगी तो उन्होनें जो कहा वो शायद मैं खुद भी कभी सपने में नहीं सोच पाती, उनके शब्द थे- “थैंक्यू सो मच बेटा, भगवान करे ज्योति जैसी जर्नलिस्ट बेटी हर घर में हो”।
मुझे समझ नहीं आया क्या कहूँ, बस मुस्कुरा कर उन्हें देखा और चश्मा लगा कर फ़िर अपने रास्ते पर चलने लगी।

आगे का सफ़र…
To be continue…

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About jyoti jain

मैं हर सन्नाटे को पिघलाकर उन्हें शब्दों में गढ़ना चाहती हूँ ताकि जो कभी कहा नहीं वो भी सुनाई दें।
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One Response to रास्तों का सफर: A journey towards life… Part-1

  1. dhreesharma says:

    अंकल जी को एक लाइन और बोलना था
    “जग घुमया थारे जैसा न क़ोई”

    good job

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