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रावणों की बस्ती में आज जलेगा रावण

क्रोध का, अहंकार का, घृणा का, पाप का, लिप्सा का, लोलुपता का, भ्रम का, झूठ का… हजारों रावण तुम्हारे भीतर जनम ले रहे हैं और प्रत्येक साल तुम्हें पाप से ज्यादा पापी बना रहा हूं मैं, इक पुतला रावण तुम्हारे मन के रावण पर हंस रहा है। Continue reading

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खुलेआम होता रक्तपात… दोषी कौन?

गोरखपुर हादसे से लापरवाही और निकृष्टता का जो शर्मनाक चेहरा उजागर हुआ उससे पूरा देश दहल गया। इतना भयावह हादसा जिसने सुना सन्न रह गया। खुलेआम होता ये रक्तपात और दोषी कोई नहीं? 30 बच्चों का रक्तपात, स्कूलों से लेकर सरकारी दफ्तर तक कोई नहीं? Continue reading

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रूह फिर जिन्दा होगी…

ज्योति जैन/ राजस्थान.   उस वक्त उसका जिस्म गर्म भट्टी की तरह तप रहा था। लाल झक्क आंखों से आंसू लावे की तरह बरस रहे थे। वो कभी उंगलियों को मुट्ठी की तरह कसकर भिंचती, कभी फिर छोड़ देती शिथिल। … Continue reading

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रास्तों का सफर: A journey towards life… Part-1

स्कूल में जब साइंस पढाई जाती थी तो ये पढाया जाता था की उर्जा ना तो उत्पन्न की जा सकती है ना ही उसे नष्ट किया जा सकता है। उसे सिर्फ़ एक रूप से दूसरे रूप में रुपान्तरित किया जा सकता है। क्या दुआएँ भी ऐसी ही होती है? तुमसे मुझ तक, मुझसे तुम तक यूँ ही स्थानांतरित होती रहती है।
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जीवन हो तुम…

क्या है नये साल के मायने…  नवचेतना, नवमंत्रणा, नवप्राण है, नवयुक्तियाँ। जी हाँ, नया साल माने सब कुछ नया सा। कुछ पुराना नहीं। पुराना कुछ हमें रास भी तो नहीं। सबमें नवीनता पसन्द है हमें। साफ़-साफ़, सुथरा- सुथरा। इसिलिये शायद … Continue reading

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कहीं ये आँखे बादल ना हो जाये…

तुम अगर अभी कुछ नहीं कर रहे हो तो एक काम करना, एक जगह बैठना जहाँ से खुला आसमाँ दिखता है। बैठकर देखना इन बादलों को रोते हुए… और देखना जमीं पर उनके आँसूओं का दरिया बनते हुए। जब बादलों … Continue reading

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बारिश…

मैंने बादलोँ को दूर कही; संदेशा भेजा था, घिर-घिर आने को; आसमाँ पे छाने को, धरती को ढाँक लेने को; तेरी सूरत गढ़ने को। ताकी मैं इन घने बादलों को… पर्वतों को चूमते देख सकूँ; जैसे मैं हर रोज देखती … Continue reading

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