बारिश…

मैंने बादलोँ को दूर कही;
संदेशा भेजा था,
घिर-घिर आने को;
आसमाँ पे छाने को,
धरती को ढाँक लेने को;
तेरी सूरत गढ़ने को।

ताकी मैं इन घने बादलों को…
पर्वतों को चूमते देख सकूँ;
जैसे मैं हर रोज देखती हूँ,
ख़्वाबो में हमारे अक्सों को।

ताकी मैं दूर क्षितिज में देख सकूँ;
बारिश की बूँदो को
धरती-बादल के मिलन का
सेतु बनते,

जैसे मैं हर रोज देखती हूँ;
हम दोनों को
दुनियां के किसी कोने पर
एक दूसरे के लिए बिलखते,
हमारे आँसुओ को
हमारे प्यार का सेतु बनते।

-ज्योति-जैन

#ये_बारिश_कैसी
#भीतर_भी#बाहर_भी

13925039_775123229296593_8432126565890168984_n

Advertisements
Posted in Uncategorized | Leave a comment

ख़ुदा के हवाले…

उस ख़ुदा से कहना कभी मेरी आँखों में आँखें डालकर मुझसे कह दे कि मेरी मुहब्बत झुठी थी। कह दे मुझसे कि मेरी मुहब्बत की किताब में वफ़ा के सफ़े कम थे। तेरे लिए हसरतें कम थी, तेरे लिए ख़्वाहिशें कम थी। मेरे हाथों की नब्ज़ थामकर कह दे मुझसे की जब-जब मेरे लबों ने तेरा नाम पुकारा, मेरी नब्ज़ मेरी धड़कनों के साथ मिलकर डुब ना गई हो। तुझसे मुहब्बत करने के बाद आराम का एक लम्हा अगर मैनें कभी बिताया हो तो कहना उससे कि मेरी साँसो के उतने ही लम्हें वो कम कर दे। वो जो ख़ुदा बनने का हक जताकरमेरी किस्मतों में इम्तिहानों की मिसाले जोड़े जा रहा है, पूछना उससे की मैनें कब उसके किसी फैसले पर सज़दा नहीं किया। ये सब पूछ लेने के बाद आखिर में पूछना उससे कि मेरे किस जनम के, किस गुनाह के वास्ते उसने मुझे यूँ अपनी अना का मसला बनाया हुआ है। और ग़र जब आखिर में कोई जवाब ना मिले तो फिर से कहना उससे कि मेरी आँखों में आँखें डालकर मुझसे एक बार कह दे कि मेरी मुहब्बत झुठी थी। तुम्हारी कसम, उसी पल उसके कदमों के हवाले मेरा सिर… मेरी आबरु… मेरा सबकुछ…

-ज्योति जैन

sufi-prism-visulised

 

Posted in Uncategorized | Leave a comment

आस्था का पर्व नवरात्रि

आश्विन मास की शुक्ल प्रतिपदा से लेकर नवमी तक नवरात्रि का त्योहार, भक्ति भावना, उत्साह-उमंग आस्था से सराबोर दिन-रात नो दिन और नौ रातों से मिल कर बनी ये नवरात्रि त्योहार के प्रारम्भ में ही कलश स्थापना की जाती है अखण्ड दीप की ज्योत प्रज्जवलित की जाती है जो लगातार नौ दिन और रात जलता रहता है। जिसके तीव्र प्रकाश में रात्रि का तम ही नही व्यक्ति के मन में छिपे दानव का दमन करने का भी सामथ्र्य होता है। नवरात्रि में लोग कन्या पूजन करते, नियम पालन करते, जागरण तथा व्रत उपवास करते, तथा दुर्गा, काली, सरस्वती, आदि का पूजन करते, प्रश्न उठता है कि आदिशक्ति का क्या दुर्गा आदि का क्या वास्तविक परिचय है और अतीत काल में कन्याओ ने क्या महान कार्य किया था जिस की स्मृति में आज तक नवरात्रि में उनका पूजन होता है। इस विषय में जानकारी के लिए तीन प्रमुख प्रसंग है-

nav
प्रथम प्रसंग के अनुसार पिछली चतुर्युगी के अन्तिम चरण में जब विनाश निकट था, तब मधु और कैटभ नामक असुरोंने देवी- देवताओं को अपना बन्दी बनाया हुआ था और तब श्रीनारायण भी मोह निद्रा में सोये हुए थे, तब ब्रम्हाजी के द्वारा आदि कन्या प्रकटहुई उसने नारायण को जगाया और उन्होने मधु तथा कैटभ का नाश कर देवी-देवताओ को मुक्त कराया।
दूसरे प्रसंग के अनुसार महिषासुर नामक असुर ने स्वर्ग के सभी देवी-देवताओं को पराजित किया हुआ था। त्रिदेव की शक्ति से एक कन्या के रूप जो आदि शक्ति प्रकट हुई वह दिव्य अस्त्रो- शास्त्रो से सुसज्जित थी, त्रिनेत्री थी और अष्ट भुजाओ वाली थी, उसने महीषासुर का वध किया और देवी-देवताओ को मुक्त कराया।
तीसरे प्रसंग के अनुसार सूर्य के वंश में शुम्भ और निशुम्भ नामक दो असुर पैदा हुए, उनके प्रधान कार्यकर्ता के नाम रक्त बिन्दु था और सेना पति का नाम धूम्रलोचन था। उसके दो मुख्य सहायको का नाम चण्ड और मुण्ड था। शिव जी की शक्ति से सो आदिशक्ति प्रगट हुई और उस के विकराल रूप से काली प्रगट हुई। उसने चण्ड-मुण्ड का विनाश किया और फिर कालिका ने रक्तबिन्दु का भी विनाश किया। रक्तबिन्दु की यह विशेषता थी कि उस के रक्त के एक बीज से एक और असुर पैदा हो जाता था। आदि कुमारी ने उसका इस प्रकार से विनाश किया कि उसका एक भी बिन्दु अथवा बीज नही रहा।

इन तीनों प्रसंगो का सार यही है कि पिछले युगों के अन्त में जब विनाश काल निकट था तब इन्हीं आदि कुमारियों अथवा शक्तियों नें आसुरी प्रवृत्तियों का नाश किया और अन्त भी ऐसा की उनका कोई बीज, कोई अंश या कोई बिन्दु भी नही रहने दिया कि जिससे संसार में फिर से आसुरियता पनप सके। उनके द्वारा ज्ञान दिये जाने की यादगार के रूप में आज नवरात्रि के आरम्भ में कलश की स्थापना की जाती है। उन द्वारा जगाये जाने की स्मृति में आज भक्तजन जागरण करते है तथा कन्याओं द्वारा आत्मिक प्रकाश किये जाने के कारण ही अखण्ड दीप जलाते है। उन कन्याओं के महान कर्तव्य के कारण ही वे हर वर्ष इन दिनों कन्या पूजन करते है और सरस्वती, दुर्गा, आदि से प्रार्थना करते है कि है अम्बे, है मां मुझे ज्ञान दो और ऐसी शक्ति प्रदान करों की मेरे अन्दर का अन्धकार मिट जाये।

– ज्योति जैन

Posted in Uncategorized | Leave a comment

युवाशक्ति… फौलाद हो तुम…

 

 

कुछ ऐसी रेखाएँ खींचे कि,

तकदीर बदल जाए।

तेवर बदले या ना बदले,

पर तासीर बदल जाए।

हम स्वयं को ऐसा बदले कि,

हम बदले तो साथ जमाना बदल जाए।

freedom

हर काल-खण्ड में यह देह चोला बदलती रही है। आज तुम हो इस आत्मा के साथी, कल कोई ओर था और आने वाले कल में कोई ओर होगा। तुम्हारा होना सच नहीं है लेकिन तुम्हारा होना,तुम्हारे ना होने के झूठ का एक प्रमाणिक सच है। तो जबतक इस देह के साथ हो अपना सर्वस्व लगा दो अपनी आत्मा की शुद्धि के लिए, और आत्मा की शुद्धता केवल मात्र परहित करके ही अर्जित की जा सकती है। और इसे करने के लिये तुम्हें भी आगे बढ़ना ही होगा।

स्वामी विवेकानंद जी ने कहा है-

“The goal is to manifest this divinity within, by controlling nature, external and internal.”

लेकिन युवा कही जाने वाली पीढ़ी तुम, तुम्हारे पास वक्त ही कहाँ है, कि तुम दो पल अपने मोबाइल की दुनिया से नजर हटा कर अपनी आस-पास की दुनिया से नजर मिला कर देख सको। टी वी, लैपटॉप, कम्प्यूटर की दुनिया में तुम नहीं तुम्हारी आत्मा कैद हो रही है। तुम्हारा शरीर तो बाहर है लेकिन तुम्हारी आत्मा, तुम्हारा ह्वदय, दिमाग सब उस 15 इंच की स्क्रीन की परिधि में सिमटता जा रहा है। इन सब चीजों का होना बुरा नहीं है, लेकिन “अति सर्वत्र जायते” का नियम हर जगह लागू होता है। उपयोग और विलासिता, इसका अन्तर करना भूलते जा रहे हो तुम, तुममें ऊर्जा है, शक्ति है, दुनिया का तख्ता पलट करने की लेकिन तुम्हारी यह सारी ऊर्जा तो कैण्डीक्रश के लेवल पार करने में ही जायां होती जा रही है। तुम्हारी साँसों में आग है, ज्वालामुखी सा फटता है तुम्हारी धड़कनों में, तुम्हारी रगों में देश का मान-सम्मान, गर्व, सब बहता है लेकिन अफसोस की ये सब अभी कैद में है। जरूरी ये है कि तुम समझो अपनी ताकतो को, युगो से जो बदलाव की मशाल तुमने अपने कन्धो पर रखी हुई है उसे अब किसी मशाल होल्डर में रख देने का क्या औचित्य है?

पहले अपना लक्ष्य तय करो, कुछ अच्छे के लिये तय करो। ऐसा लक्ष्य जो तुम्हारे साथ-साथ देश-दुनिया को भी पल्लवित करें। फिर उसे पाने के लिये डट जाओ… भिड़ जाओ… खुद को खुद के कम्फर्ट जोन के उस बिछौने से उठाओ जो तुम्हें आलस के तोहफ़े दे रहा है। कड़ी मेहनत करो, रुकना भूल जाओ, टहलना भूल जाओ, रेंगना भुल जाओ, सोते जागते सिर्फ़ और सिर्फ़ अपना लक्ष्य याद रखो। याद रखो की तुम्हें कुछ करना है, और जब तक तुम वो कर नहीं लेते भुल जाओ हर सुविधा का सुख। सुविधा उपयोग लेने के लिये है, भटकने के लिये नहीं है। अपनी आँख को अर्जुन की आँख की तरह बनाओ, जिसे सिर्फ़ चिड़िया की आँख की तरह अपना लक्ष्य दिखायी दे, और कुछ नहीं… जब  अपना लक्ष्य तय कर लो तो तैयार हो जाओ खुद को मेहनत की तपती भट्टी में झोंकने के लिए। रोज अपने कर्मों के कोयले डालो इस भट्टी में… जब इस भट्टी से पुरी तरह झुलस जाओ और फिर भी तुम्हारी जुबान से तुम्हारी मंजिल का पता ना मिट पाये तो समझो की तुमने अमृत बना पी लिया है अपने सपने को… ऐसा हो जाने के बाद अब तुम तैयार हो अपने लक्ष्य से एकाकार करने के लिये।  अब तुम्हें आगे बढ़ने से, कुछ कर दिखाने से कोई नहीं रोक सकता… तुम भी नहीं… चाहकर भी नहीं।

एक बात हमेशा याद रखो कि कोई भी लक्ष्य हासिल करना कभी मुश्किल या नामुमकिन नहीं होता, मुश्किल और नामुमकिन जो होता है वो है खुद को उस लक्ष्य के लायक बना पाना। खुद में वो काबिलियत लाना जो तुम्हें तुम्हारे लक्ष्य का प्रबल दावेदार बना सके। और जिस दिन तुमने खुद को इस काबिल बना लिया उस दिन तुम तैयार हो जाओगे दुनिया में एक नयी शक्ति का संचार करने के लिये।

आखिर में यहीं कि अगर भटकने से खुद को रोकना है तो लक्ष्य की पटरी पर अपने पैर जमा कर बढ़ते जाओ।

युवाशक्ति… फौलाद हो तुम…

 

ज्योति  जैन

Posted in Uncategorized | Leave a comment

माँ <3

हम सभी की जिन्दगी में एक अनमोल रिश्ता होता है, एक ऐसा रिश्ता जिसका जब भी नाम लो एक निस्वार्थ मूरत ही आँखों के सामने तैरने लगती है । जो हर प्रेम की पराकाष्ठा होती है, जिसकी छवि इन्सान को अपने बिम्ब में भी दिखती है और प्रतिबिंम्ब में भी। वही जो हमारे लिये टुकड़ो-टुकड़ो में बंट कर भी पूरी-पूरी जुड़ जाती है। मेरी नजर में ऐसी शख्सियत सिर्फ़ “माँ” है। माँ सिर्फ़ माँ है, उनके जैसा कोई नहीं इस रिश्तों के खजाने में, और शायद इसिलिये वो माँ है और हम सभी सिर्फ़ इन्सान है जमाने में…  

image source google

दिल जो मेरा मन्दिर हो तो,

भगवान मेरी माँ तुम ही हो।

चुनर दुनिया ओढ़ा भी दे तो,

घर-बार मेरी माँ तुम ही हो।

काट-छाँट के रिश्तों में भी,

ताबीज मेरी माँ तुम ही हो।

सच कोई आखरी ख्वाहिश हो तो,

हर जनम मेरी माँ तुम ही हो।

‪#‎माँ_रूपी_ईश्वर_को_शत_शत_नमन‬… _/\_

Posted in Uncategorized | 2 Comments

मैं नहीं पापा…

मुझे नहीं पता था की आज फादर्स डे है, पर फिर सोचती हूँ की अगर पता भी होता तो क्या कर लेती? कोई केक ले आती जिसपर “Love you papa” लिखा होता, या फिर रसोई में जाकर शगुन के कुछ पकौड़े तल देती। लेकिन क्या इन सब ताम झाम में कभी आपसे खुद कह पाती की “PAPA, I LOVE YOU”. कभी नहीं, तारीखों पर टिका कोई भी दिन इतना मजबूत अभी नहीं हो पाया की उम्र के साथ हमारे बीच बन चुकी ये मर्यादा की दिवार को तोड़ सके। और उस पर भी अलग-अलग कमरों में बहते हमारे आँसू इस दिवार को और भी ज्यादा मजबूत करते जा रहे है।
मुझे आज तक भी समझ नहीं आया की हम हिन्दुस्तानी लड़कीयों को ये तो सिखा दिया जाता है की सबके लिये मन में प्रेम रखो, लेकिन फिर कभी ये क्यों नहीं बताया जाता की उस प्रेम को व्यक्त कैसे करो? अगर मम्मी से प्यार करते हो तो कैसे कहो? या अगर पापा से कहना हो तो कैसे कहो? हर बार प्यार खामोशी से ही समझा जाये ये जरुरी तो नहीं, खुलकर कह देना भी तो सुकून देता है।

लेकिन पता नहीं क्यूँ इस बढ़ती उम्र ने दिलों को भी बड़ा कर दिया, इतना बड़ा की पापा, जो कुछ भी आपसे कहना होता है वो इस दिल में ही कैद होकर रह जाता है। और कुछ वक्त बाद इसी दिल में दफन भी हो जाता है; हमेशा के लिये। बड़ी होती बेटियों के दिल में दफन एसी ही कुछ बातें बताऊँ क्या पापा?

सब बेटियाँ चाहती है की आज भी सुबह उनके पापा ही उन्हें जगाये, ठीक वैसे ही जैसे बचपन में स्कूल जाने के लिये जगाया करते थे। सुबह ब्रुश करते वक्त तरह-तरह के मुँह बनाते हुये जोर-जोर से हँसना शायद अब सबकी नजरों में खटके लेकिन आज भी अगर सुबह की शुरुआत एसी हो तो दिन भर रोना मंजूर है पापा। सड़क पार करते वक्त हम बेटियाँ आज भी चाहती है की हमारी उँगली हमारे पापा पकड़ ले, वजह ये नहीं की सड़क पार करने में डर लगता है। बस इस दुनिया की भीड़ में भी आप हमारे लिये फौलाद बन खड़े है साथ में, ये एहसास सुकून देता है। स्कूल अब नहीं जाते हम, लेकिन शाम को घर लौटने पर आज भी मन करता है की दौड़ कर आपके गले में झूल जाये। अब तो इस वात्सल्य के स्पर्श के लिये त्यौहारों का इन्तजार करना पड़ता है। बचपन में घर-घर खेलते हुये खाली कप में झुठमुठ की चाय आपको पिलाने की इच्छा आज भी है क्योंकि आजकल सचमुच की चाय पर भी वैसी खुश तारीफ किसी के चेहरे पर नहीं दिखती जैसी बचपन में आपके चेहरे पर दिखती थी।

image source google

इस तेज दौड़ती हुई दुनिया में आत्मनिर्भर होना आप ही ने सिखाया है पापा, लेकिन छोटी-छोटी लापरवाहियॉ करने को मन करता है की आप आओ और टोक कर बताओ की इस काम को एसे नहीं बल्कि इस तरह से किया जाता है।
इस सच को समझना पापा की इस बड़ी होती उम्र ने हम बेटियों से बेटी होने के बहुत से एहसास ही छिन लिये। ये किमत हर बेटी को चुकानी पड़ रही है, यकीन मानो पापा ये किमत बहुत ज्यादा है इस उम्र की। और इस किमत को चुकाते-चुकाते हर बेटी पत्थर होती जा रही है।
हमारे लिये आप ही सुपरमैन होते है पापा, हमारी सारी परेशानियों का हल आपके ही पास होता है। इस बार भी आप ही जीत जाना इन परेशानोयों से, रोक देना वक्त को ये किमत लेने से। बेटियाँ कहती नहीं लेकिन केक पर लिखा Love you उनके ही दिल का आईना होता है। इसलिये प्लीज पापा, इस फादर्स डे कुछ ना भी हो तो भी अपनी बेटियों को गले लगा लेना, फिर वो शायद रो दे, तो उन्हें रोने देना…
दिल में दफन बहुत सी बातें बहा देनी जरुरी होती है।

-ज्योति

Posted in Uncategorized | 1 Comment

शब्दों की दुनिया… #A world of words

मैंने तो अपने जीवन में स्वरों को जाना है, मेरी हर अभिव्यक्ति उन्हीं से ही, उन्हीं को मैंने जीवन में पहचाना है, पर अब ऐसा लगता है कि शब्दों के बिना कई बातें अनकही रह जाएगी। वे मेरे साथ ही चली जाएंगी। इसीलिए शब्दों की दुनिया में कदम रख रही हूं। अपनी भावनाओं को साझा कर रही हूं।

1Image source Google 

बोले हुए शब्द सुनने वाले के दिल तक पहुंचने से पहले अपना अर्थ खो देते हैं, मन में उठे विचार जुबां तक आते-आते अपना असर खो देते हैं। नजर कुछ कहना चाहती है किन्तु पल-पल झपकती पलक अंदाज बदल देती है। ख्वाबों और ख्यालों की पाकीजगी आखिर किस माध्यम से कायम रहे? बहुत सोचने पर केवल एक रास्ता मिला खुद को अभिव्यक्त करने का और वह है शब्दों की दुनिया… शब्दों की रंगीन दुनिया से मेरा रिश्ता नया है लेकिन अनजाना नहीं है। मेरा यह रिश्ता भावनात्मक तादाम्य का है, क्योंकि यह रिश्ता शर्तहीन है।
गलत न समझे जाने के भय से मुक्त, अभिव्यक्त होने की चाह इंसान को कहां से कहां ले जाती है। मरुस्थल सी जिंदगी में अभिव्यक्ति की तलाश नई भी नहीं है और अजीब भी नहीं है। हर इंसान खुद को अभिव्यक्त करना चाहता है लेकिन कभी शब्द साथ नहीं होते तो कभी विचारों के झंझावत से हम खुद ही नहीं निकल पाते।

3.jpgImage source Google 

विचारों की अभिव्यक्ति नितान्त आवश्यक है। क्या कभी सोचा है कि यदि हम अपनी भावनाओं को ही नहीं कह पाए तो…? क्या होगा तब…? तो हमारी निजता तथा स्वाभाविकता हमारे लिए भ्रम तथा अफवाहों का अंधड़ रच देगी।
इंसान सोचता है कि वह जो करता है उससे कोई फर्क नहीं पड़ता? दरअसल हम गलत दिशा में अच्छाई को नापने की कोशिश करते हैं। हम सोचते हैं कि जरूरत पडऩे पर ही खुद को अभिव्यक्त करना चाहिए लेकिन इतना तो सोचकर देखिए कि जब तक हम खुद को अभिव्यक्त नहीं करेंगे कोई हमें कैसे समझेगा? हम किसी को वही चीज दे सकते हैं जो हमारे पास है, जिस तरह प्यार देने पर प्यार मिलता है, सम्मान देने पर सम्मान मिलता है, उसी तरह खुद को अभिव्यक्त करने पर व्यक्तित्व को एक पहचान का अहसास मिलता है।
हम सभी को जिंदगी मिली है हमें पूरा हक है कि हम इसे जीएं। जब भी कभी जिंदगी की किताब एक पन्ना और पलटें, उस पर गाढ़ी स्याही लुढ़के या कहीं रोशनी का रंग बिखरे, इन सभी एहसासों को बयां करने के लिए शब्दों का साथ होना जरूरी है।
हमारी जिंदगी के रंगदान में जितने भी रंग होते हैं वे हम सभी देखते हैं। उत्साह, उमंग, तालियां, शाबासी, खुशी, आंसू, उदासी, गम चाहे जो भी एहसास हो हम उसे महसूस करते है। कभी किसी बात पर हम भीतर से हुलस उठते हैं तो कभी कोई घटना हमारे भीतर सहेज कर रखी गयी यादों के कांच की तरह चटखकर टूटन की आवाज पैदा कर देती है। इस टूटन की आवाज को, खुशी के एहसास को दूसरों तक पहुंचाने के लिए शब्दों को माध्यम बनाना बेहद जरूरी है।
कहने की हो कोई बात।
या हो खुशी का कोई एहसास।।
नहीं चाहिए किसी कांधे का सहारा।
मिल जाए अगर शब्दों का किनारा।।

Posted in Uncategorized | Leave a comment